कारक की परिभाषा, भेद और उदाहरण – Karak Ki Paribhasha aur Bhed [in Hindi]

दोस्तों आज हम पढ़ेंगे की कारक किसे कहते हैं? (Karak Kise Kahte hain?) कारक की परिभाषा क्या है? (Karak ki Paribhasha) और कारक के कितने भेद होते हैं (Karak ke Bhed)? कारक हमें वाक्य को पूरा करने में सहायता हैं और हिंदी व्याकरण (Hindi Grammar) की दुनिया में इनका बड़ा योगदान है।

कारक किसे कहते हैं? (Karak Kise Kahte Hain?)

कारक (Karak) का शाब्दिक अर्थ है, क्रिया को समूर्ण रूप देना। हमारे शरीर में बहुत सारे अंग हैं, और प्रत्येक अंग का एक दूसरे से गहरा संबंध होता है। यदि शरीर का एक अंग भी खराब हो जाता है, तो पूरा शरीर गड़बड़ा जाता है। उसी प्रकार किसी वाक्य में प्रयोग हुए शब्दों का भी एक दुसरे से सम्बन्ध होता है। यदि किसी शब्द को बीच में से हटा दिया जाए या उल्टा-सीधा लगा दिया जाये तो वाक्य-संरचना गड़बड़ा जाएगी।

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दोस्तों आज हम कारक की परिभाषा, कारक (Karak) के उदाहरण और कारक के भेद जानेंगे और इन्हें सरल शब्दों में समझने का प्रयाश भी करेंगे।

कारक ही एक ऐसा तत्व है जिसके कारण कर्ता, कर्म तथा क्रिया का स्वरुप निर्धारित होता है।

कारक की परिभाषा क्या है? (Karak ki Paribhasha)

संज्ञा या सर्वनाम का जो रूप क्रिया के साथ संज्ञा या सर्वनाम का सम्बन्ध बताए, उसे कारक (Karak) कहते हैं।

उदाहरण (Udaahran)

सेना के जवानों ने अपने देश की आन रखने के लिए शत्रु सैनिकों को चुन-चुनकर मारा।

अब इस वाक्य में ‘किसने’, ‘किस लिए’, ‘किसको’, का सम्बन्ध क्रिया ‘मारा’ से है। यहां पर मारा क्रिया है।

इस उदाहरण में ‘के’, ‘ने’, ‘के लिए’, ‘को’ को आदि ने सभी संज्ञा शब्दों के साथ क्रिया के सम्बन्ध को स्थापित किया। इन शब्दों को कारक चिन्ह (Karak Chinh) या परसर्ग (parsarg) कहते हैं।

कभी-कभी बिना कारक चिन्हों के भी संज्ञा, सर्वनाम शब्दों का सम्बन्ध क्रिया के साथ अपने-आप ही हो जाता है।

जैसे- राधिका नाचती है- इसमें किसी कारक चिन्ह का प्रयोग नहीं किया गया है।

माधुरी ने खेल दिखाया – यहां पर ‘ने’ कारक चिन्ह का प्रयोग किया गया है।

माधुरी खेल दिखाया – यह वाक्य असुद्ध है क्योंकि इसकी परिस्थिति अनुसार इसमें कारक चिन्ह ‘ने’ होना चाहिए था।

इस प्रकार स्वतः किसी वाक्य में कारक के परसर्ग का न आना उचित माना जाता है, लेकिन जान-बूझ कर कारक चिन्ह को वाक्य से हटा देना उसे असुद्ध बना देता है।

विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गयी कारक की परिभाषा:

“क्रिया के साथ जिसका सीधा सम्बन्ध हो उसे कारक कहते हैं। ” – पंडित किशोरी दास

“संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप का सम्बन्ध वाक्य के किसी दूसरे शब्द के साथ प्रकाशित होता है, उसे कारक कहते हैं।” – पंडित कामता प्रशाद गुरु

“वाक्यों में नाम-पद का क्रिया के साथ जो संबंध होता है, उसे ‘कारक’ कहते हैं।”

“कारकों-द्वारा संज्ञा या सर्वनाम शब्दों का सम्बन्ध, वाक्य के अन्य शब्दों के साथ जाना जाता है। कारकों (परसर्ग) के चिन्हों को विभक्ति कहते हैं। – डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय

कारक के भेद या प्रकार (Karak Ke Bhed ya Prakaar)

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कारक के आठ भेद या प्रकार होते हैं।

1. कर्ता कारक (Karta Karak)

2. कर्म कारक (Karm Karak)

3. करण कारक (Karan Karak)

4. सम्प्रदान कारक (Sampradan Karak)

5. अपादान कारक (Karan Karak)

6. सम्बन्ध कारक (Sambandh Karak)

7. अधिकरण कारक (Adhikaran Karak)

8. सम्बोधन कारक (Sambodhan Karak)

चलिए अब हम लोग कारकों को विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं।

कर्ता कारक (Karta Karak)

काम को करने वाला अर्थात जिससे क्रिया के करने वाले का बोध हो, उसे कर्ता (Karta Karak) कहते हैं। कर्ता कारक परसर्ग ‘ने’ है।

हम कह सकते हैं की जो संज्ञा शब्द अपना कार्य कर रहा हो वो भी किसी पर निर्भर किए बिना, उसे कर्ता कारक कहते हैं।

उदाहरण (Udahran):

रमेश ढोलक बजाता है।

सीमा गाना गाती है।

राहुल ने खाना गाया।

गोपेश ने पुष्तक पढ़ी।

पहले दो वाक्यों में कारक चिन्ह का प्रयोग नहीं किया गया है, अर्थात ये दोनों ही वाक्य परसर्गरहित हैं। ऐसे वाक्यों में आप प्रश्न पूछ कर कर्ता कारक को पहचान सकते हैं। आपको ‘कौन’, ‘किसने’ लगाकर प्रश्न करना होता है, फिर जो उत्तर आपको प्राप्त होता है वही कर्ता है। जैसे –

कौन ढोलक बजाता है? – रमेश (‘रमेश’ कर्ता है।)

कौन गाना जाती है? – सीमा (‘सीमा’ कर्ता है।)

अंतिम दो वाक्यों में करक चिन्ह ‘ने’ का प्रयोग किया गया है।

किसने खाना खाया? – राहुल ने (‘राहुल’ कर्ता है।)

किसने पुष्तक पढ़ी? – गोपेश ने (‘गोपेश’ कर्ता है।)

इन बातों का ख़ास ध्यान रखें। 

1) अकर्मक क्रिया के साथ ‘ने’ कारक चिन्ह नहीं लगता। जैसे – सचिन खेलता है।

2) कर्म प्रधान क्रिया के कर्ता के आगे कोई चिन्ह नहीं लगता। जैसे- क्रिकेट खेला गया।

3) जब वाक्य में दो क्रियाएं होती हैं तब प्रथम क्रिया के साथ करता मुख्य रूप से होता है और दूसरी के साथ गौण रूप में; जैसे – रक्षिता घर गयी और सो गयी।

4) अपूर्ण भूत और भविष्य काल में करता के साथ ‘ने’ कारक चिन्ह (कारक चिन्ह को हम परसर्ग या करक की विभक्ति भी बोलते हैं) नहीं लगता; जैसे – राहुल जा रहा है।  आशु गायन कर रहा है।

कर्म कारक (Karm Karak)

वाक्य में जिस संज्ञा या सर्वनाम पद पर क्रिया का प्रभाव पड़े, उसे कर्म कारक (Karm Karak) कहते हैं। कर्मकारक का परसर्ग ‘को’ है।

उदाहरण (Udahran)- 

आशु ने सुभाष को पढ़ाया।

माता जी बच्चों को खाना खिला रही हैं।

यहां पहले वाक्य में ‘पढ़ाया’ क्रिया क्रिया है, जिसका प्रभाव सुभाष पर पड़ रहा है। अतः हम यह कह सकते हैं की सुभाष कर्म कारक हुआ।

चलिए सरल शब्दों में समझते हैं।

आशु ने किसे पढ़ाया?

उत्तर- सुभाष को।

इसलिए यहां पर ‘सुभाष’ कर्म कारक है।

यहां पर ‘आशु’,जो की कर्ता है, वह ‘शुभाष’ को पढ़ाने का काम कर रहा है इसलिए शुभाष कर्म कारक हुआ क्योंकि क्रिया का प्रभाव सुभाष पर पड़ रहा है।

दूसरे वाक्य में

माँ किसे खाना खिला रही हैं?

उत्तर- बच्चों को।

अतः बच्चा कर्म कारक हुआ।

किसने खाना खिलाया?

उत्तर- माँ ने।

यहां पर माँ शब्द कर्ता हुआ।

इन बातों का रखें ध्यान।

1) सकर्मक क्रिया का पूरक भी कर्म कारक में होता है। जैसे- राहुल को गवैया बना दें। इस वाक्य में ‘गवैया’ कर्म कारक है।

2) क्रिया के आगे ‘किसको’ और ‘क्या’ लगाने से जो उत्तर मिलता है, वही कर्म होता है।

3) कहीं-कहीं कर्म कारक के परसर्ग ‘को’ का प्रयोग नहीं होता है। जैसे- मैं अमरुद खता हूँ।

करण कारक (Karan Karak)

कर्ता जिसकी सहायता से कुछ कार्य करता है, उसे करण कारक (Karan Karak) कहते हैं। इसका परसर्ग ‘से’ है।

इसकी एक और परिभाषा हम देख सकते हैं।

शब्द के जिस रूप से इस बात का पता चले कि क्रिया किस साधन की सहायता से की गयी है, उसे करण कारक कहते हैं।

बच्चे बस से स्कूल जाएंगे।

यहां पर जाने की क्रिया में ‘बस’ साधन की सहायता ली गयी है। अतः ‘बस’ करण कारक है।

राहुल चम्मच से खाना खाएगा।

यहां पर खाने की क्रिया में ‘चम्मच’ साधन की सहायता ली गई है। अतः ‘चम्मच’ करण कारक है।

ध्यान रखने योग्य बातें।

कर्मवाच्य में कर्ता करण कारक में रहता है। जैसे – हाथ से फल तोड़ा गया।

सम्प्रदान कारक (Sampradan Karak)

सम्प्रदान का अर्थ है, प्रदान करना या देना। जिसके लिए काम किया जाता है, उसे ‘सम्प्रदान कारक’ (Sampradan Karak) कहते हैं। सम्प्रदान कारक का परसर्ग ‘को’, ‘के लिए’ तथा ‘के वास्ते’ है।

उदाहरण (Udahran)

घोड़े के लिए चारा लाओ।

कुत्ते को भोजन दो।

ऊपर के वाक्यों में प्रयुक्त की गयी क्रियाएं घोड़े और कुत्ते के लिए हैं।

अतः घोड़े और कुत्ते सम्प्रदान कारक हैं।

अपादान कारक (Apadan Karak)

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से पृथकता या अलगाव का भाव स्पष्ट होता है, उसे अपादान कारक (Apadan Karak) कहते हैं। इसका परसर्ग ‘से’ है।

उदाहरण (Udahran)

पेड़ से फल गिरे।

यहां पर ‘फल’ का अलगाव ‘पेड़’ से हो रहा है। अतः ‘पेड़’ अपादान कारक है।

संबंध कारक (Sambandh Karak)

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से उनका सम्बन्ध वाक्य में प्रयुक्त की गई दूसरी संज्ञा या सर्वनाम से हो, उसे सम्बन्ध कारक (Sambandh Karak) कहते हैं। यानी की हम यह कह सकते हैं अगर एक वस्तु का सम्बन्ध किसी दूसरे वस्तु के साथ है तो वह सम्बन्ध कारक के अंतर्गत आता है। परसर्ग ‘का’, ‘के’, ‘की’ हैं।

उदाहरण (Udahran):

अमर का मकान अच्छा है।

राहुल की बकरी काली है।

अमीश की पुष्तक मेलुहा के मृत्युंजय अच्छी है।

याद रखने योग्य बात 

सम्बन्ध कारक की पहचान के लिए क्रिया के साथ ‘किसका’, ‘किसकी’ तथा ‘किसके’ लगाकर प्रश्न करने पर जो उत्तर मिलता है, वह सम्बन्ध कारक है।

जैसे- किसका मकान अच्छा है?

उत्तर- अमर का

अमर यहां पर सम्बन्ध कारक है।

अधिकरण कारक (Adhikaran Karak)

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया के स्थान, समय तथा अवसर का पता चलें उसे अधिकरण कारक (Adhikaran Karak) कहते हैं।

इसके परसर्ग ‘में’, ‘पे’, ‘पर’ हैं।

उदाहरण (Udahran):

खेत में फसल लहलहाए।

वृक्ष पर चिड़ियाँ बैठी हैं।

विशेष: अधिकरण कारक में क्रिया के साथ ‘किसमें’, ‘किस पर’ प्रश्न करने पर जो उत्तर मिलता है, वही अधिकरण कारक है।

सम्बोधन कारक (Sambodhan Karak)

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से किसी को बुलाया, पुकारा, या सम्बोधित किया जाए, उसे सम्बोधन कारक (Sambodhan Karak) कहते हैं।

उदाहरण (Udaahran)

हे भगवान्! मेरी रक्षा करो।

अरे! यह क्या हो गया।

भैया! रास्ता बताना।

बच्चों! इधर आओ।

‘हे’, ‘अरे’, के अतिरिक्त ‘भैया’ और ‘बच्चों’ शब्द में बिना परसर्ग के सम्बोधन हो रहा है।  इसमें दूसरे कारकों की तरह परसर्ग का प्रयोग न होकर केवल अव्यय (हे, अरे ,ओ, अजी, आदि) शब्दों का प्रयोग होता है।

कारक सम्बन्धी विशेष बातें। 

1. कर्ता के ‘ने’ चिन्ह का प्रयोग वर्तमान काल और भविष्य काल में नहीं होता है। इन कालों में करता परसर्गरहित होता है।

जैसे- मैं पढ़ रहा हूँ।

राहुल खेल रहा है।

मैं पढूंगा।

राहुल खेलेगा।

ऊपर दिए हुए वाक्य या तो वर्तमान काल हैं या फिर भविष्य काल, इसलिए यहां पर ‘ने’ परसर्ग का प्रयोग नहीं हुआ है।

2. जब वाक्य में प्राणिवाचक कर्म हो, यो उसके साथ ‘को’ परसर्ग लगता है जबकि अप्राणिवाचक कर्म प्रायः परसर्गरहित रहता है। जैसे-

राहुल ने मोहन को चौकाया (परसर्गसहित)

राहुल ने आम खरीदा  (परसर्गरहित)

यदि अप्राणिवाचक कर्म के साथ ‘को’ लगाना हो, तो वाक्य का रूप इस प्रकार होगा-

स्वप्निल ने आम को खरीदा।

3. अधिकरण कारक कभी कभी परसर्गरहित भी हो सकता है।

मास्टर जी हमारे घर पधारे।

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