मंगल ग्रह से जुडी जानकारी हिंदी में: Mars Planet in Hindi

मंगल (Mars) सौर मण्डल का चौथा ग्रह है। मंगल का आकार सौर मण्डल में मौजूद ग्रहो में बुध के बाद सबसे छोटा है। मंगल की पृथ्वी से दूरी (Mars Distance From Earth) 8.24 करोड़ किलोमीटर, व सूर्य से दूरी (Mars Distance from Sun) 22.8 करोड़ किलोमीटर है। मंगल पर एक दिन की लम्बाई 24 घण्टे 30 मिनट से थोड़ा ज्यादा, पृथ्वी पर दिन के लम्बाई के लगभग बराबर है। मंगल को सूर्य का एक पूरा चक्कर लगाने में, यानी मंगल पर एक साल पूरा होने में, वहां के दिनो में लगभग 687 दिन है।

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मंगल को लाल गृह क्यों कहते हैं? -Why Mars is Called Red Planet

मंगल को लाल ग्रह (Red Planet) भी कहा जाता है, क्योंकि मंगल की मिट्टी में लोहे के खनिज मौजूद हैं, जिनके ऑक्सीकरण  होने (यानी जंग लगने) के कारण  मिट्टी लाल दिखाई देती है।

मंगल की बनावट: About Mars Structure in Hindi

मंगल की सतह ठोस है तथा इसका वातावरण कार्बन डाइऑक्साइड, आर्गन, नाइट्रोजन और थोड़ी मात्रा में ऑक्सीजन और पानी के वाष्प से बना है। मंगल की सतह जीवन के लायक नहीं है।

मंगल का वातावरण बहुत ठंडा रहता है यहां का औसतन तापमान शून्य से 80 डिग्री फारेनहाइट नीचे रहता है। मंगल की सतह पर घाटी, ज्वालामुखी और सूखी झील के निशान देखने को मिलते हैं। इसकी सतह की धूल लाल रंग की है। मंगल पर वातावरण में गैस की उपस्थिति के कारण पृथ्वी की तरह कभी-कभार धूल भरी आंधी आती है और धूल के तूफान के बवंडर भी दिखाई देते हैं। मंगल के बड़े तूफान इतने बड़े होते हैं कि पूरे ग्रह को कवर कर सकते हैं, जो पृथ्वी से भी दिखाई पड़ सकती है।

मंगल पर मौसम, ध्रुवों पर बर्फ, घाटी और असक्रिय ज्वालामुखी, इस बात का सबूत देते हैं कि यह ग्रह कभी सक्रिय भी था।

मंगल का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का लगभग एक तिहाई है। मंगल का वातावरण भी पृथ्वी की तुलना में बहुत पतला है। यहां के वायुमंडल में 95% से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड तथा 1% से भी कम ऑक्सीजन उपस्थिति है। अतः मंगल की सतह पर बिना ऑक्सीजन सिलेंडर के मनुष्य का जीवन असंभव है।

मंगल पर शुरूआती खोज (mangal ki khoj) 

1965 में नासा का स्पेसक्राफ्ट मेरिनर 4, मंगल की तरफ उड़ान भरी और दूसरे ग्रहों की फोटो लेने वाला पहला स्पेसक्राफ्ट बना। 1976 में, वाइकिंग 1 और वाइकिंग 2 मंगल पर उतरने वाले पहले नासा के अंतरिक्ष यान बने। दोनों अंतरिक्ष यान ने मंगल की करीब से फोटो ली और सतह का डाटा एकत्र किया।

उसके बाद से कई अंतरिक्ष यान मंगल की परिक्रमा की और कुछ रोवर मंगल पर उतरे। हालांकि सबकी रुचि इसी में थी कि मंगल ग्रह पर शुरुआती समय में पानी था या नहीं। जीवित चीजों के लिए पानी की आवश्यकता होती है। अतः अगर यह सिद्ध हो जाए कि मंगल ग्रह पर शुरुआती समय में पानी मौजूद था, तो जीवन की मौजूदगी के भी सबूत मिल सकते हैं।

नासा के spirit और opportunity रोवर ने मंगल पर उन खनिजों की खोज की जो केवल पानी में मिल सकते हैं। अतः इससे यह सबूत मिला कि मंगल ग्रह पर कभी पानी मौजूद था। नासा के Mars Global Surveyor ऑर्बिटर ने मंगल की 9 साल तक जांच की, और पाया कि मंगल ग्रह पर भी पृथ्वी की तरह चुंबकीय क्षेत्र था जो सूर्य और ब्रह्मांड से आने वाली घातक किरणों से मंगल को बचाता था।

शुरूआती मंगल

मंगल हमारे सौरमंडल का सबसे ज्यादा खोज किए जाने वाला ग्रह है। मंगल एक मात्र ऐसा ग्रह है जहां की सतह पर मानव निर्मित रोवर है। अभी नासा के 3 स्पेसक्राफ्ट, यूरोप और भारत का एक-एक सेटेलाइट मंगल की कक्षा में चक्कर लगा रहे हैं, और नासा का एक रोवर और लैंडर मंगल की सतह पर हैं। इन सब से यही सबूत एकत्र हुए हैं, कि मंगल पर लाखों साल पहले पृथ्वी की तरह मौसम, सतह गरम, वायुमंडल मोटा हुआ करता था।

तो फिर ऐसी कौन सी चीज है, जिसके कारण मंगल आज बेजान है। ऐसा माना जाता है कि मंगल पर सब कुछ होने के बावजूद वह पृथ्वी से सिर्फ एक ही चीज में पीछे रही वह यह थी कि मंगल के कोर में पृथ्वी की तरह उतनी ताकतवर मैग्नेटिक फील्ड नहीं थी, जितनी पृथ्वी की है।

हमने अपने पिछले लेख में शुक्र के बारे में बताया था कि वह कैसे बेजान हो चुकी थी। जबकि शुरुआती दिनों में वह पृथ्वी की तरह हुआ करती थी। ठीक उसी तरह की कहानी कुछ मंगल की भी है। यह दोनों ग्रह सूर्य और ब्रह्मांड से आने वाले हाई चार्ज्ड पार्टिकल का शिकार हुए। जब ऐसे पार्टिकल्स वायुमंडल में प्रवेश करते हैं तो आयन और इलेक्ट्रॉन में टूट जाते हैं और इनके कारण वायुमंडल के गैस पार्टिकलस टकराने के कारण चार्ज होते हैं और वह ग्रह के गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होकर ब्रह्मांड में चले जाते हैं। जिससे धीरे-धीरे वायुमंडल पतला होता जाता है और वह बाहर से आने वाले कणों को रुकने में पहले से ज्यादा असक्षम हो जाता है। वायुमंडल के पतले होने पर वाष्पित पानी जो कि बादल होता है ब्रह्मांड में मुक्त हो जाता है, जिससे धीरे-धीरे मंगल अपना पानी खोते गया।

मंगल के चाँद: Mars Moons

मंगल के 2 चाँद हैं। जिनके नाम Phobos (फोबोस) और Deimos (डीमोस) हैं। ये दोनों चाँद बहुत छोटे हैं। फोबोस व्यास (Diameter) 23 किलोमीटर और डीमोस का व्यास मात्र 6 किलोमीटर है। जिस कारण इनका गुरुत्वाकर्षण बहुत कम है, और इनका आकर पूरा गोलाकार भी नहीं है। इनके उत्पति का कारण यह माना जाता है की ये एस्टेरोइड बेल्ट के एस्टेरोइड हुआ करते थे, वृस्पति के गुरुत्वीय धक्के के कारण ये मंगल के तरफ आये और मंगल के गुरुत्वाकर्षण में फसकर चक्कर लगाने लगे।

फोबोस हर साल मंगल की परिक्रमा करते हुए 2 मीटर करीब जा रहा है। 5 से 10 करोड़ साल बाद यह या तो मंगल से टकराएगा या फिर कुचलकर मंगल के कक्षा में रिंग बना देगा। अगर यह मंगल से टकराता है तो मंगल पर तबाही ला देगा। भविष्य के मंगलवासियों को इसका इंतज़ाम करना होगा। जबकि डीमोस हर साल मंगल से दूर जा रहा है, भविष्य में यह मंगल के गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होकर बाहरी अंतरिक्ष में चला जायेगा।

मंगल पर जीवन / Life on Mars

मंगल पर पानी के सबूत मिलने के साथ ही यह भी माने जाने लगा कि मंगल पर शुरुआती जीवन की उपस्थिति रही होगी। हालांकि वह शुरुआती जीवन एक कोशिकीय जीव तक ही विकसित हो पाया होगा। कुछ धारणाएं यहां भी हैं कि पृथ्वी पर मौजूद कुछ जीव मंगल से ही आए हुए हैं। जो कि मंगल पर किसी एस्ट्रॉयड या कॉमेट की टक्कर की वजह से उछली चट्टानो के पृथ्वी पर आने की वजह से हो सकती है।

मिशन मंगलयान (Mission Mangalyaan)

मार्स आर्बिटर मिशन या मंगलयान को मंगल के अध्ययन के लिए इंडियन स्पेस एंड रिसर्च आर्गेनाइजेशन(ISRO) द्वारा बनाया गया है। इसका काम मंगल की सतह की विशेषताएं मंगल पर खनिज व वातावरण का पता लगाना है। इसके लिए यह अंतरिक्ष यान पांच वैज्ञानिक उपकरणों से सुसज्जित है। इसमें मार्स कलर कैमरा, लाइनमैन अल्फा फोटोमीटर, थर्मल इमेजिंग स्पेक्ट्रोमीटर, मार्स इक्सोफेरिक न्यूट्रल कंपोज एनालाइजर और मीथेन सेंसर है।

मंगलयान भारत के श्रीहरिकोटा में स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से पोलर सैटलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी सी 25) द्वारा 5 नवंबर 2013 को भारतीय समयानुसार 2:38 PM पर लांच किया गया। यह पृथ्वी की कक्षा से 1 दिसंबर 2013 को मंगल ग्रह के लिए रवाना हुआ। 300 दिन के बाद 24 सितंबर 2014 को भारतीय समय अनुसार 5:32 PM  पर अंतरिक्ष यान 76 घंटे के लिए मंगल की अंडाकार कक्षा में रहा। यह मिशन सिर्फ 6 से 10 महीनों के लिए योजनारत थी लेकिन आर्बिटर आज भी कार्यरत है। इस मिशन की कुल लागत 4.5 बिलियन रुपए यानी 70 मिलियन अमेरिकी डॉलर है।

Mars exploration Rovers

जनवरी 2004 में spirit और opportunity नामक दो रोवर मंगल ग्रह पर अलग-अलग किनारों पर NASA द्वारा भेज गए। ये रोवर 1997 में लॉन्च किए गए मार्स पाथफाइंडर रोवर के अपग्रेडेड वर्जन थे। ये रोवर ने मंगल ग्रह की सतह पर कई किलोमीटर चले। और वायुमंडल, भू विज्ञान का आकलन किया। दोनों रोवर्स ने प्राचीन मंगल के वातावरण की में कई प्रमाण पाये, जोकि लाखों साल पहले मंगल जीवन की योग्य था। दोनों रोवर्स ने अपने पहले से नियोजित 90 दिवसीय मिशन के जीवन काल को पूरा करते हुए आगे भी कार्य जारी जारी रखा। Spirit रोवर की 22 मार्च 2010 को पृथ्वी के साथ अंतिम संचार हुआ, तब तक रोवर अपनी मूल डिजाइन से 20 गुना ज्यादा समय तक कार्य कर चुकी थी। जबकि opportunity लॉन्चिंग के एक दशक बाद तक भी कार्यरत था, मंगल पर 2018 में आये डस्ट स्टॉर्म (Dust Storm) के बाद पृथ्वी स्टेशन से सम्पर्क टूट गया। 2015 में opportunity ने 42 किलोमीटर की दूरी चलकर रिकॉर्ड बनाया था।

अब तक मंगल पर कुल 4 रोवर्स की लैंडिंग हो चुकी है जिनके नाम सोजर्नर (sojourner), Spirit, अपॉर्चुनिटी (opportunity), क्युरिऑसिटी (curiosity) हैं। हाल में जुलाई 2020 में Perseverance रोवर को पृथ्वी से NASA द्वारा लांच किया गया, जो कि फरवरी 2021 में मंगल पर लैंड होगा।

Colony on MARS

1969 में इंसानो के चाँद पर पैर पड़ने के साथ ही सपने और आकांक्षाएं भी अंतरिक्ष में और आगे जाने के लिए बड़ी थी।  हालाँकि 1972 के अपोलो मिशन के बाद 2020 तक इंसान दूसरी बार इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से आगे नहीं गया। लेकिन 2020 में प्राइवेट कंपनी SpaceX द्वारा NASA के एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस स्टेशन तक भेज कर अपनी इंफ्रास्ट्रक्चर को साबित किया। SpaceX, Starship स्पेसक्राफ्ट द्वारा चाँद और मंगल पर जाने की तैयारी में है। starship का आकर अभी की स्पेसक्राफ्ट के मुकाबले कही ज्यादा होगा, जिसमे एक बार में 100 आदमियों के लिए जगह होगी।

SpaceX का प्लान मंगल पर इंसानो की कॉलोनी बनाने का है। जिसके लिए वहाँ के संसाधनों का इस्तेमाल ज्यादातर किया जाना है। हालाँकि यह किसी भी तरह से आसान नहीं होगा।

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