क्रिया किसे कहते हैं? भेद और उदाहरण – Kriya in Hindi Grammar

दोस्तों क्रिया हिंदी व्याकरण (Hindi Vyakaran) में एक महत्वपूर्ण विषय है। क्रिया बिन वाक्य अधूरा सा हो जाता है। अब हम क्रिया पर विस्तृत जानकारी प्राप्त करने जा रहे हैं। आज हम क्रिया किसे कहते हैं,  क्रिया के भेद , क्रिया के उदाहरण आदि पर चर्चा करेंगे। क्रिया के विषय में सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए कृपया अंत तक पढ़ें।

क्रिया की परिभाषा / क्रिया किसे कहते हैं (Verb in Hindi)

Verb / kriya definition in Hindi: ऐसे शब्द, जिससे किसी कार्य का करना या होना पाया जाए उसे क्रिया(verb) कहते हैं।

अब आपसे कोई पूछेगा kriya kise kahte hain? तो आप आसानी से बता सकते हैं।

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क्रिया के उदाहरण / Examples of Verb

वह किताब पढ़ रहा है

कल वह लखनऊ जायेगा

राहुल ने गाना गाया

मीरा ने नाच दिखाया

समीर ने अभिनय किया

लड़की खेल रही है

वाक्यों को बनाने के लिए क्रिया एक महत्वपूर्ण किरदार निभाता है। क्रिया हिंदी व्याकरण का एक महत्वपूर्ण अंग है। आप कह सकते हैं की क्रिया बिना वाक्य सूना-सूना सा लगता है। क्रिया का निर्माण और उसे पहचानना बहुत ही आसान काम है। सभी प्रकार की क्रियाएं कुछ मूल शब्दों से बनी होती हैं, इन मूल शब्दों को हम ‘धातु’ कहते हैं। जैसे- ‘खायेगा’ में ‘खा’ धातु है। ‘जायेगा’ में ‘जा’ धातु है।

घर में कुर्सी है

वह घर है

यहां ख़ुशी है, वहां गम है

यहाँ कोई कुछ कर नहीं रहा है।  बस किसी के होने भर की बात कही गयी है।

हम यह कह सकते हैं की जिन शब्दों में किसी के होने न होने या किसी कार्य को बताया गया हो, उन शब्दों को क्रिया कहते हैं।

क्रिया का धातु व सामान्य रूप

हम सब जानते हैं की हमारी रोज़ के प्रयोग की चीज़ें किसी न किसी धातु से बनी हुई हैं। आप कई चीज़ों का प्रयोग करते हैं  जो प्लास्टिक, लोहे, चांदी, ताम्बे, पीतल जैसी धातु से निर्मित हैं। आप जिन चीज़ों का प्रयोग करते हैं वो कई धातुवों के मूल से बने हैं। इसी प्रकार, क्रिया के मूल रूप को भी हम ‘धातु’ कहते हैं।

चलिए अब हम कुछ उदाहरणों के ज़रिये इन बातों को समझते हैं।

‘चलना’ में ‘चल’ धातु है।

‘ढालना’ में ‘ढल’ धातु है।

‘गलना’ में ‘गल’ धातु है।

‘खिलना’ में ‘खिल’ धातु है।

‘मिलना’ में ‘मिल’ धातु है।

‘लिखना’ में ‘लिख’ धातु है।

क्रिया के भेद (kriya ke bhed) / Types of Verbs in Hindi

क्रिया के भेद दो आधारों पर किये गए हैं।

1. प्रयोग के आधार पर – अकर्मक क्रिया और सकर्मक क्रिया

2. रचना के आधार पर – सामान्य क्रिया, मिश्र क्रिया, नामधातु क्रिया, संयुक्त क्रिया, प्रेरणार्थक क्रिया, पूर्वकालिक क्रिया और ध्वन्यात्मक क्रिया।

प्रयोग के आधार पर क्रिया के भेद।

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अकर्मक क्रिया (Akarmak Kriya) / Intransitive Verb

जिस क्रिया में कर्म नहीं होता, और ना ही कर्म की उपेक्षा (आशा या इच्छा) रहती है, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं।

बच्ची सो रही है।

लड़का खेल रहा है।

यहां ‘सोना’ और ‘खेलना’ क्रियाएँ, ‘बच्ची’ और ‘लड़का’, कर्ता के साथ हैं।  इन दोनों क्रियाओं के होने का सीधा प्रभाव कर्ता पर पड़ रहा है। ये क्रियाएं यहां अकर्मक क्रियाएं हैं। सरल शब्दों में समझें तो अगर कोई क्रिया किसी वाक्य में प्रयोग हुई हो और वह क्रिया कर्ता की स्थिति बताये ऐसी क्रियाएं अकर्मक क्रियाएं कहलाती हैं।

पानी बरसा

बिजली चमकी

गीदड़ भागा

बिल्ली दुबकी

ऊपर के वाक्यों में किसी कर्म की जरूरत महसूस नहीं हो रही है।

इस तरह की सभी क्रियाएं अकर्मक क्रियाएं कहलाती हैं।

अकर्मक क्रियाओं में ज्यादातर वाक्य अधूरे लगते हैं और ज्यादातर में सहायक क्रिया की अनुपस्थिति  होती है।

विशेष:  कर्म की अनुपस्थिति होने भर से कोई क्रिया अकर्मक क्रिया नहीं बन जाती।

जैसे- बालिका पढ़ रही है।

बालिका क्या पढ़ रही है ? आप देख सकते हैं। यदि नहीं भी देख सकते तो भी कुछ होगा तभी उसे ‘पढ़ा’, ‘लिखा’, ‘देखा’ जाएगा। यहां जो कर्म है, वह छिपा हुआ है। ऐसे कर्म को सुप्त कर्म कहते हैं।

सकर्मक क्रिया (sakarmak kriya) / Transitive Verb

जिस क्रिया के व्यापर का फल कर्ता पर नहीं बल्कि कर्म (सुप्त या जागृति, उपस्थिति या अनुपस्थिति) पर पड़ता है, उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं।

बच्चा दूध पी रहा है।

खिलाड़ी फूटबाल खेल रहे हैं।

वह फिल्म निर्माण कर रहा है।

यहां ऊपर दिए रेखांकित शब्द सकर्मक क्रियाएं हैं। क्योंकि इनसे पूरी जानकारी प्राप्त हो रही है।

आप खुद से सवाल कर के जान सकते हैं जैसे बच्चा दूध पी रहा है। अब आप सवाल करें बच्चा क्या पी रहा है? उत्तर है ‘दूध’, जैसा की आपने देख यहां आपको ज़वाब मिल रहा है। वहीँ अकर्मक क्रिया में कोई ज़वाब नहीं मिलता।

जैसे – वे खेल रहे हैं। अब आप सवाल करे वह क्या खेल रहे हैं ? इसका ज़वाब वाक्य में नहीं लिखा है। यह अधूरी जानकारी है। इसलिए यहां खेलना अकर्मक क्रिया है।

सकर्मक क्रिया के भेद

एककर्मक क्रिया

द्विकर्मक क्रिया

एककर्मक क्रिया

जिस क्रिया का केवल एक (प्रस्तुत या अप्रस्तुत) कर्म हो, उसे एककर्मक क्रिया कहते हैं।

वह क्रिकेट खेलता है।

अब आपको खुद से सवाल करना होगा।

क्या खेलता है ?

उत्तर- क्रिकेट

तो यहां आप देख सकते हैं सिर्फ क्रिकेट की बात हो रही है। यानी की सिर्फ एक व्यक्ति के बारे में बात हुई है। तो यहां पर एक कर्म है ‘क्रिकेट’, इसलिए यहां ‘खेलता’ क्रिया एककर्मक क्रिया हुई।

तुम मेरे लिए प्रार्थना करो।

एक कर्म ‘प्रार्थना’ तो यहां क्रिया ‘करो’ हुई एककर्मक।

द्विकर्मक क्रिया

जिस क्रिया के एक से अधिक प्रस्तुत या अप्रस्तुत कर्म हों, उसे द्विकर्मक क्रिया कहते हैं।

तुम उसे फूल दो।

किसे दो? – उसे

क्या दो? – फूल

इस प्रकार यहां ‘उसे’ और ‘फूल’ दो कर्म हुए, तो क्रिया ‘देना’ द्विकर्मक क्रिया हुई।

ध्यान देने योग्य बात।

मान लो अगर यह वाक्य हो।

राहुल ने क्रिकेट, बैडमिंटन, चैस और फुटबॉल खेला।

यहां दिखने में तो कर्म तीन दिख रहे हैं, लेकिन इन्हें एक ही कर्म माना जायेगा। यहां खाना क्रिया द्विकर्मक नहीं मानी जायेगी।

यदि वाक्य होता – ‘तुमने फल, मिठाई, और चावल दिए।’

यहां ‘देना’ क्रिया द्विकर्मक होगी क्योंकि कोई तो है जिसे यह सामान दिया जा रहा है।

अकर्मक क्रिया और सकर्मक क्रिया की पहचान।

क्रिया के सामने आप प्रश्न रख कर देखें जैसे – क्या, किसे, किसको। यदि उत्तर मिले या मिल सकता है तो क्रिया सकर्मक हुई और ना मिले तो अकर्मक

उदाहरण के ज़रिये समझते हैं।

वह फूटबाल खेल रहा है?

प्रश्न- क्या खेल रहा है?

उत्तर- फुटबॉल

मोहन ने सोहन को पीटा।

प्रश्न- मोहन ने किसे पीटा?

उत्तर – सोहन को।

उसने रोहन को किताब दी।

प्रश्न – किसे दी ?

उत्तर – रोहन।

इन तीनों ही वाक्यों में क्रियाएं सकर्मक हैं।

वह हंस रहा है – अकर्मक।

क्योंकि यहां ‘क्या’, ‘किसे’, ‘किसको’ में से किसी का उत्तर नहीं मिल रहा है।

लेकिन ‘हंसना’ या ‘रोना’ का प्रयोग इस रूप में हो, तो-

वह हंसी है रहा है।

वह रोना रो रहा है।

यहां कर्म की उत्पत्ति सामान्य से अलग स्थितियों में है। ऐसे प्रयोगों की क्रियाओं को सकर्मक क्रिया के अंतर्गत ही रखना होता है।

रचना के आधार पर क्रिया के रूप।

सामान्य क्रिया

कुछ क्रियाए भाषा व् व्यवहार में परम्परागत रूप से चली आ रही है। इन क्रियाओं में धातु के साथ ‘ना’ प्रत्यय लगता है। ऐसी क्रियाओं को सामान्य क्रिया कहते हैं। जैसे-

डर + ना = डरना

जल + ना = जलना

संयुक्त क्रिया

जब एक से अधिक क्रियाएं मिलकर किसी एक क्रिया का निर्माण करते हैं, तो उस क्रिया को संयुक्त क्रिया कहते हैं। जैसे-

वह चला गया। (चलना और जाना)

तुम सो गए। (सोए भी, गए भी)

अब जाग जाओ। (जागो और जाओ)

यहां क्रिया ने संयुक्त रूप धारण कर अलग ही अर्थ दिया है, जो संयुक्त क्रिया का मौलिक अर्थ है।

मिश्र क्रिया

जिस क्रिया का पहला भाग संज्ञा या सर्वनाम के रूप में हो और दूसरा या शेष भाग धातु से बनी क्रिया हो और दोनों मिलकर एक क्रिया की रचना करते हों, उसे मिश्र क्रिया कहते हैं।

जैसे-

मेरा मुँह खुल गया तो जाने क्या होगा।

दांत दिखाना बंद करो।

ऊपर ‘दांत’ और ‘मुंह’ संज्ञाएँ ‘दिखाना’ और ‘खुलना’ के साथ मिश्रित हो गयी हैं।

प्रेरणार्थक क्रिया

जहां कर्ता क्रिया के करने में परोक्ष रूप से भूमिका निभाता है वहां क्रिया प्रेरणार्थक क्रिया हो जाती है। सीधे शब्दों में, जैसे –

छोटेलाल जी बर्तन साफ़ कर रहे हैं। (सामान्य क्रिया करना)

छोटेलाल जी बर्तन साफ़ करवा रहे हैं। (प्रेरणार्थक क्रिया ‘करवाना’)

वह फल खाता है। (सामान्य क्रिया करना)

वह फल खिलाता है। (प्रेरणार्थक क्रिया ‘खिलाना’)

प्रेरणार्थक क्रिया के दो उपभेद होते हैं –

प्रथम प्रेरणार्थक क्रिया 

जिसमें व्यक्ति क्रिया करने में सीधे तौर पर जुड़ा है।

जैसे- मान बच्चे को दूध पिलाती है।

यहां ‘माँ’ क्रिया शब्द ‘दूध पिलाना’ में सीधे संलग्न है, दूध पीने की क्रिया बेशक बच्चा कर रहा है या बच्ची कर रही है।

द्वितीय प्रेरणार्थक क्रिया 

इस प्रकार की प्रेरणार्थक क्रिया में व्यक्ति दूर से प्रेरक की भूमिका निभाता है। जैसे –

माँ बच्चे को दूध पिलवाती है।

मैं तुम्हें पानी भिजवाती हूँ।

दीदी मुझे कहानी सुनवाती थीं।

यहां ‘माँ’, ‘मैं’ और ‘दीदी’ क्रिया करवाने की परोक्ष रूप से प्रेरणा दे रहे हैं।

ध्यान देने वाली बात

जब अकर्मक क्रियाओं से प्रेरणार्थक क्रियाएं बनाई जाती हैं तब सकर्मक क्रियाएं बन जाती हैं। जैसे- बोलना अकर्मक क्रिया है जबकि इससे बनी प्रेरणार्थक क्रिया ‘बुलाना’ सकर्मक है।

नामधातु क्रिया

जो क्रिया ‘धातु’ से नहीं बनी, बल्कि संज्ञा (किसी नाम) या सर्वनाम से बनती है, वह नामधातु क्रिया कहलाती है। जैसे

अपनाना  (अपने से)

हथियाना (हाथ से )

बतियाना (बात से)

लतियाना (लात से)

पूर्वकालिक क्रिया

जिस क्रिया का काल मुख्य क्रिया से पहले संपन्न हो चुका हो, तो वह ‘चुकी हुई’ क्रिया पूर्वकालिक क्रिया कहलाती है।

आप नहाकर आए हैं।

अब खाकर सो जाइये।

उसे जागने पर देखना।

यहां ‘नहाना’, ‘खाना’  और ‘जागना’ क्रियाएं पूर्वकालिक क्रियाएं हैं।

अनुकरणात्मक (ध्वन्यात्मक) क्रिया

कुछ क्रियाएं ध्वनि पर आधारित होती हैं, अर्थात ध्वनि के आधार पर बनाई जाती हैं। ये अनुकरणात्मक या ध्वन्यात्मक क्रियाएं कहलाती हैं। जैसे –

मक्खियाँ भिनभिनाती हैं।

चिड़िया चहचहाती हैं।

घोड़े हिनहिनाते हैं।

ज़्यादा दनदनाओ मत।

क्रिया की वृत्ति

हर क्रिया कोई-न-कोई अर्थ, भाव, दशा, संकेत या अभिप्राय प्रकट करती है। जब क्रिया का रूप वक्त के कहने का अर्थ या प्रयोजन का संकेत देता हो, तो इसे क्रिया की वृत्ति कहा जाता है। क्रिया की वृत्ति आज्ञार्थक, इच्छार्थक, संकेतार्थक, सन्देहार्थक, निश्चयार्थक, प्रश्नार्थक और निषेधार्थक हो सकती है।

आज्ञार्थक – इस प्रकार की क्रिया में आदेश या निवेदन दोनों ही आ जाते हैं।

वहां जाकर बैठें।

गाडी चलाओ।

कृपया धीरे बोलें।

इच्छार्थक – इसमें इच्छा या अपेक्षा का भाव प्रमुख रहता है।

आप मुझसे कुछ देर और बात कर लेते।

सदा सुखी रहो।

सन्देहार्थक – जहां क्रिया के होने में अनिश्चय की स्थिति बनी हुई हो।

शायद कल विद्यालय न खुले।

संकेतार्थक –  इस प्रकार की क्रिया में कार्य के साथ कारण को जोड़ दिया जाता है।

बारिश होगी तो गर्मी दूर हो जाएगी।

फिल्म अच्छी होगी तो हिट हो जायेगी।

निश्चयार्थक – जहां क्रिया में निश्चित रूप से कुछ कहा गया हो।

ठीक चार बजे फिल्म आएगी।

सरकार बनते ही शपथ ग्रहण समारोह होगा।

प्रश्नार्थक – जहां क्रिया किसी प्रश्न के साथ आ रही हो।

जहां क्रिया किसी प्रश्न के साथ आ रही हो।

आप कब घर जायेंगे?

क्या उन्होंने चुनाव जीत लिए?

निषेधार्थक – जहां क्रिया किसी चीज़ की मनाही की तरफ संकेत करती नज़र आये।

वे उधर नहीं गए थे।

मैंने ऐसा कभी नहीं कहा।

क्रिया का पक्ष। 

क्रिया के जिस तत्व से उसके आरम्भ होने, मध्य में होने, सम्पूर्ण होने इत्यादि का संकेत मिलता है, उसे क्रिया का पक्ष कहते हैं।

जैसे-

वह हंसने लगा।  आरम्भ सूचक

नदी बाह रही है। गति सूचक

वह आगे बढ़ेगा ही। प्रगति सूचक 

उसने भोजन कर लिया है। पूर्णता सूचक

हवा हर समय चलती है।  नित्यता सूचक 

उसने बार-बार प्रयाश किया तो बहुत कुछ सीख गयी।  नित्यता सूचक

क्रिया के लिंग व वचन पर प्रभाव

क्रिया के लिंग व वचन पर कर्ता या कर्म प्रभाव डालते है। इस कारण से क्रिया अपना रूप बदल लेती है। क्रिया के इस रूप परिवर्तन को अन्विति कहा जाता है।

* यदि कर्ता परसर्गरहित हो तो क्रिया के लिंग और वचन करता के अनुसार होंगे। जैसे-

दीपक क्रिकेट खेलता है

सुनीता क्रिकेट खेलती है

* यदि वाक्य में एक लिंग के अनेक कर्ता हों, तो क्रिया उसी लिंग में बहुवचन में होगी।

महल लाल की बेटियां और भतीजियां खेल रही हैं

रज़्ज़ाक, हरिशंकर और अनवर खा रहे हैं।

* यदि वाक्य में विभिन्न लिंगो के कई प्राणीवाचक कर्ता हों, तो क्रिया अंतिम कर्ता के लिंग के अनुसार किन्तु बहुवचन में होंगी। यदि वाक्य में कई अप्राणिवाचक कर्ता हों, तो क्रिया के लिंग व वचन अंतिम कर्ता के अनुसार होंगे।

निहारिका, शीतल और रमेश खा रहे हैं

खूँटी से कमीज और एक कोट लटका है

खूँटी से एक कोट और एक कमीज लटकी हैं

* यदि वाक्य में कई कर्ता अलग-अलग पुरुषवाचक सर्वनाम हों, तो क्रिया के लिंग और वचन अंतिम पुरुषवाचक सर्वनाम के अनुसार होंगे।

तुम और मैं आऊंगा

तुम और वह जाएगा

वह और मैं जाऊंगा

वह और तुम जाओगे

* यदि कर्ता के साथ ‘ने’ या ‘से’ परसर्ग लगा हो और कर्म के साथ ‘को’ परसर्ग न लगा हो, तो क्रिया की अन्विति कर्म के साथ होगी।

गौरव ने रोटी खाई

गौरव से रोटी नहीं खाई जाती

गौरव ने ढेले फेंके

गौरव से ढेले नहीं फेके जाते

* यदि वाक्य में एक ही लिंग हों, तो क्रिया के लिंग और वचन उनके अनुसार होंगे।

पीटर ने पुस्तक और सब्ज़ी खरीदी

पीटर ने पुस्तक और शब्जियां खरीदीं

* यदि वाक्य  में भिन्न लिंगों के कर्म हों, तो क्रिया के लिंग और वचन अंतिम कर्म के अनुसार होंगे।

रोहन ने पुष्तक और केले खरीदे

रोहन ने केले और पुष्तक खरीदी

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